राजनीतिक

234 विधायकों को सरकारी कार देने पर घमासान, DMK के 59 विधायकों ने ठुकराया ऑफर

चेन्नई
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति विजय ने घोषणा की है कि राज्य के सभी 234 विधायकों (MLAs) को मुफ्त सरकारी गाड़ियां दी जाएंगी लेकिन उनके इस ऐलान पर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सियासी तकरार शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री के ताजा ऐलान के दो दिन बाद यानी शुक्रवार को मुख्य विपक्षी पार्टी डीएमके (DMK) ने राज्य पर बढ़ते कर्ज का हवाला देते हुए इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। विधानसभा में विपक्ष के नेता (LoP) उदयनिधि स्टालिन ने कहा कि उनकी पार्टी DMK के सभी 59 विधायकों ने इस ऑफ़र को ठुकराने का फ़ैसला किया है।

उदयनिधि ने कहा, "चूंकि TVK सरकार सत्ता में आने के पहले दिन से ही कह रही है कि सरकार पर कर्ज़ है, इसलिए DMK के सभी 59 विधायकों ने इस ऑफर का फायदा न उठाने का फैसला किया है। हम सरकार से आग्रह करते हैं कि विधायकों को मुफ़्त कारें तभी दी जाएं जब उनके चुनावी हलफनामों की जांच कर ली जाए कि क्या उनके पास पहले से कारें हैं या नहीं और उनकी आर्थिक स्थिति क्या है?"

फ्रीबीज पर भी तंज
उन्होंने टीवीके के 'मुफ्त उपहारों' (freebies) के विरोध वाले रुख पर भी तंज कसा। DMK नेता ने कहा, "TVK ने कहा था कि वे मुफ्त सुविधाओं के खिलाफ हैं और लगातार कहते रहे हैं कि सरकार कर्ज में है; इसलिए, हमने सरकार पर कर्ज का बोझ कम करने के लिए इस पेशकश को स्वीकार न करने का फैसला किया है।" DMK प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने भी विजय सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि जनता के पैसे को इस तरह की विलासिता पर खर्च करना प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए। विपक्ष ने मांग की है कि विधायकों को गाड़ियां देने से पहले उनके चुनावी हलफनामों की जांच की जानी चाहिए कि उनके पास पहले से कारें हैं या नहीं, और उनकी वास्तविक वित्तीय स्थिति क्या है।

सरकार की तरफ से योजना का जोकदार बचाव
दूसरी ओर, सरकार की तरफ से मंत्री आधाव अर्जुना ने इस योजना का जोरदार बचाव किया है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री का उद्देश्य सभी विधायकों को समान दर्जा देना है। उन्होंने दलील दी कि कम्युनिस्ट और वीसीके (VCK) जैसे छोटे दलों के कई विधायकों की वित्तीय स्थिति बेहद कमजोर है। अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लोगों की समस्याओं को सुनने और यात्रा करने के लिए गाड़ी कोई विलासिता नहीं बल्कि एक बुनियादी जरूरत है। इसके साथ ही, मंत्री अर्जुना ने विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन पर व्यक्तिगत निशाना साधते हुए पूछा, “अगर विपक्ष के नेता को कार नहीं चाहिए, तो वे सरकारी आवास में क्यों रह रहे हैं, जबकि उनके पास खुद के तीन बंगले हैं?” इस तीखे हमले पर डीएमके के वरिष्ठ नेता के.एन. नेहरू ने जवाब दिया कि विपक्ष के नेता को कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है और अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए आधिकारिक आवास में रहना उनकी प्रशासनिक आवश्यकता है।

कैसे शुरू हुआ यह विवाद?
इस पूरे मामले की शुरुआत 12 अगस्त को हुई थी, जब वीसीके (VCK) की विधायक जे. जोथिमनी ने सचिवालय आने-जाने में होने वाली कठिनाइयों का हवाला देते हुए विधायकों के लिए सरकारी वाहन की मांग की थी। इसके बाद मुख्यमंत्री विजय ने घोषणा की कि उन विधायकों को गाड़ियां दी जाएंगी जिनके पास व्यक्तिगत कार नहीं है। घोषणा के तहत विधायकों को गाड़ी के साथ ईंधन, ड्राइवर और गाड़ी के रखरखाव के लिए 75,000 रुपयए और एक कार्यालय सहायक के लिए 25,000 (कुल 1 लाख रुपये) का मासिक भत्ता भी दिया जाना तय हुआ था। इस घोषणा के बाद सचिवालय में महिंद्रा स्कॉर्पियो और एक्सयूवी 3XO जैसे मॉडल्स विधायकों के चुनने के लिए खड़े भी कर दिए गए थे।

अन्य दलों का रुख क्या है?
इस विवाद के बीच सीपीआई (CPI) के विधायक थलाई रामचंद्रन ने भी स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी इस मुफ्त कार के प्रस्ताव को खारिज करेगी। वहीं पीएमके (PMK) के विधायक गणेश कुमार ने सुझाव दिया है कि सरकार को वाहन उपलब्ध कराने से पहले विधायकों की वित्तीय स्थिति का आकलन जरूर करना चाहिए।

मुफ़्त कार ऑफ़र क्या है?
मुख्यमंत्री विजय ने बुधवार को घोषणा की थी कि राज्य सरकार सभी 234 विधायकों को एक सरकारी गाड़ी देगी। सरकार गाड़ी के रखरखाव के लिए हर महीने 1 लाख रुपये का भत्ता, एक ड्राइवर और ऑफ़िस में मदद के लिए स्टाफ़ भी देगी। समाचार एजेंसी ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, इस घोषणा के बाद गुरुवार को सचिवालय में विधायकों की पसंद के लिए महिंद्रा की स्कॉर्पियो और XUV 3XO जैसी कई SUV गाड़ियाँ खड़ी की गई थीं। इस फ़ैसले पर अब राजनीतिक बहस छिड़ गई है; DMK ने तमिलनाडु पर आर्थिक बोझ का ज़िक्र करते हुए गाड़ियों पर सरकार के खर्च करने के फ़ैसले पर सवाल उठाए हैं।

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