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वेटर बने, मजदूरी की, उत्तर प्रदेश के रामबाबू अब विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में दिखाएंगे दम

सोनभद्र

सोनभद्र के बहुआरा गांव में एक खपरैल की छत वाले कच्ची मिट्टी के घर में रहने वाले छोटेला और मीना देवी को 24 अगस्त का खास इंतजार है। इस दिन उनका बेटा रामबाबू बुडापेस्ट में विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 35 किलोमीटर पैदल चाल में चुनौती पेश करेगा। कभी वेटर और मनरेगा मजदूर रहे रामबाबू के लिए यहां तक का सफर कड़े संघर्ष वाला रहा है।

मेढ़ों पर दौड़ने से शुरुआत लंदन ओलंपिक का सजीव प्रसारण देखने के बाद रामबाबू ने फैसला किया वह खिलाड़ी बनेंगे। साल 2012 में उन्होंने गांव की मेढ़ों पर दौड़ना शुरू कर दिया था। गांव में ही दो सौ मीटर के ट्रैक पर भी वह अभ्यास करते थे। पहले रामबाबू ने सोचा कि धावक बनेंगे। फिर उन्होंने पैदल चाल का अभ्यास शुरू कर दिया। गांव में सुविधा नहीं थी तो वाराणसी आ गए। अभ्यास के बाद खुराक के पैसे नहीं थे तो एक होटल में वेटर बन गए। तभी कोरोना संक्रमण फैल गया। होटल बंद हो गया। रामबाबू गांव लौट गए। गांव में पिता के साथ मनरेगा के तहत तालाब खोदने के काम में लग गए। किसी तरह घर का खर्च चलने लगा।

रामबाबू ने बताया कि कोरान से जब स्थितियां सामान्य हुईं तो भोपाल चले गए। कोच एवं पूर्व ओलंपियन बसंत बहादुर राणा ने उन्हें ट्रेनिंग दी। लगन और मेहनत से रामबाबू ने राष्ट्रीय ओपेन चैंपियनशिप में 35 किलोमीटर पैदल चाल में हिस्सा लिया। उसमें उन्होंने स्वर्ण जीता। इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय कैंप में जगह मिल गई। कैम्प में शामिल किए जाने के बाद रामबाबू की तकदीर ही बदल गई। इसी साल 25 मार्च को उन्होंने स्लोवाकिया में 22956 घंटे का समय निकाल अपना राष्ट्रीय कीर्तिमान तोड़ा।

पक्का घर बनवाएंगे, बहन को अच्छी शिक्षा दिलाएंगे

रामबाबू ने बताया कि उन्होंने अपना खेल जीवन शुरू करने से पहले जो सपने देखे थे वो अब पूरे हो रहे हैं। पैसों की दिक्कत दूर ही रही है। अब जो भी पैसे मिलेंगे उनसे वह गांव वाला मकान पक्का करवाएंगे। एक हैंडपंप लग जाएगा जिससे उनके पिता को पीने के लिए एक किलोमीटर दूर से पानी नहीं लाना होगा। छोटी बहन को अच्छी शिक्षा दिलवाएंगे। विश्व चैंपियनशिप में वह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेंगे। वहीं अगले माह शुरू हो रहे एशियाई खेलों में वह स्वर्ण जीतने के लिए ताकत लगा देंगे।

 

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